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Haiku
Leben geht, Tod kommt
das Laub zitterte grundlos
Tod ging, Leben kam
|
part 1: |
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(1–37) |
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01 |
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01 |
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* = footnotes! ® chapters! |
a 01-06 |
* |
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道可道, |
01 |
Ein Dào, das man ergründen kann, |
|
非常道。 |
02 |
ist nicht jenes ewige Dào dann; |
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名可名, |
03 |
begreifbare Begrifflichkeiten |
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非常名。 |
04 |
sind nicht Begriffe für alle Zeiten! |
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無名天
地之始, |
05 |
Der Ursprung der Welt ist nicht zu verstehen, |
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有名
萬物之母。 |
06 |
doch als Urmutter aller Dinge zu sehen. |
|
* |
b 07-10 |
* |
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故
常無欲, |
07 |
Frei von Begehren stets – kurzum |
|
以觀其妙。 |
08 |
erschaut man so sein Mysterium; |
|
常有欲, |
09 |
begehrlich aber zu allen Zeiten, |
|
以觀其徼。 |
10 |
erblickt man nur Oberflächlichkeiten. |
|
* |
c 11-15 |
* |
|
此兩者
同出, |
11 |
Beides war gemeinsam entstanden, |
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而異名, |
12 |
so unterschiedlich wir es auch fanden |
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同謂之
玄。 |
13 |
und zusammen geheimnisvoll nannten – |
|
玄之
又玄, |
14 |
wie immer noch geheimer gar |
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眾妙之
門。 |
15 |
uns aller Mysterien Pforte war... |
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02 |
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02 |
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* |
a 01-02 |
* |
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天下皆知
美之為美
斯惡已; |
01 |
Kennt Schönes als Schönheit jeder weltweit, dann ebenso wohl Hässlichkeit; |
|
皆知
善之為善
斯不善已。 |
02 |
kennt jeder der Güte guten Gebrauch, dann kennt er wohl das Böse auch. |
|
* |
b 03-08 |
* |
|
故
有無相生, |
03 |
Wie Sein und Nichts einander verwenden, |
|
難易相成, |
04 |
Schweres und Leichtes einander vollenden, |
|
長短相形, |
05 |
Länge und Kürze einander gestalten, |
|
高下相傾, |
06 |
Hoch und Tief zueinander halten: |
|
音聲相和, |
07 |
So harmonieren Stimme und Chor, |
|
前後相隨。 |
08 |
so folgen Danach sich und Zuvor. |
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* |
09-16 |
* |
|
是以聖人處
無為之事, |
09 |
Da Weise im Handeln nicht-eingreifend bleiben, |
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行不言之教。 |
10 |
das Lehren ganz ohne Worte betreiben, |
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萬物作焉
而不辭。 |
11 |
wohl alles sich darin gebiert, |
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生
而不有, |
12 |
Schöpferisch sind sie und häufen nicht auf, |
|
為而不恃, |
13 |
sie wirken, doch pochen sie nicht darauf; |
|
功成
而弗居。 |
14 |
ihre Aufgaben vollenden sie, doch Anspruch darauf erheben sie nie. |
|
夫唯弗居, |
15 |
Denn häuft man eben nichts mehr an, |
|
是以不去。 |
16 |
bleibt nichts, was man verlieren kann. |
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03 |
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03 |
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* |
a 01-06 |
* |
|
不尚賢, |
01 |
Verherrlicht man die Würdigen nicht |
|
使民不爭。 |
02 |
und lässt nicht alle auf Wettstreit erpicht, |
|
不貴
難得之貨, |
03 |
nicht preisen schwer zu erlangende Sachen |
|
使民不為盜。 |
04 |
wird die Leute nicht zu Räubern machen. |
|
不見可
欲, |
05 |
Nicht sehen können, was man begehrt, |
|
使民心
不亂。 |
06 |
belässt Eure Herzen unversehrt. |
|
* |
b 07-11 |
* |
|
是以
聖人之治, |
07 |
Wo also ein weiser Mensch regiert, |
|
虛其心, |
08 |
da leert er erst, wonach man giert, |
|
實其腹, |
09 |
stillt ihr Bedürfnis, |
|
弱其志, |
10 |
nicht ihren Eifer, |
|
強其骨。 |
11 |
und macht sie so von innen reifer. |
|
* |
c 12-15 |
* |
|
常使民
無知無欲, |
12 |
Lässt unmerklich alle stets wunschlos reifen |
|
使夫智者
不敢為也。 |
13 |
und Wissende nicht wagen einzugreifen. |
|
為無為, |
14 |
So handelt, aber greift nicht ein, |
|
則無不治。 |
15 |
dann wird nichts unerledigt sein! |
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04 |
|
04 |
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* |
a 01-04 |
* |
|
道沖,
而用之, |
01 |
Das Dào: wie „leer“, doch im Gebrauch |
|
或不盈。 |
02 |
andererseits nicht zu füllen auch. |
|
淵兮, |
03 |
Abgründig, ach, es muss wohl ein |
|
似萬物之宗。 |
04 |
Urahn aller Wesen sein. |
|
* |
b 05-08 |
* |
|
挫其銳, |
05 |
Ihre Schärfe mildert es ganz, |
|
解其紛, |
06 |
löst, was sie in Verwirrung hält, |
|
和其光, |
07 |
harmonisch macht es ihren Glanz |
|
同其塵。 |
08 |
und vereint sich mit ihrer Welt. |
|
* |
c 11-12 |
* |
|
湛兮 |
09 |
Verborgen, ach ... |
|
似或存。 |
10 |
und dennoch da; |
|
吾不知誰之子, |
11 |
ich weiß nicht, wessen Kind es war – |
|
象帝之先。 |
12 |
des Himmels Vorspiel offenbar. |
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05 |
|
05 |
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* |
a 01-04 |
* |
|
天地
不仁, |
01 |
Freundlich sind Himmel und Erde nie: |
|
以萬物
為芻狗*。 |
02 |
die Wesen behandeln wie Strohhunde sie... |
|
聖人不仁, |
03 |
Nicht freundlich sind auch die Weisen, oh: |
|
以百姓
為芻狗*。 |
04 |
als Strohhund behandeln sie alle so! |
|
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|
* |
b 05-08 |
* |
|
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|
天地之間, |
05 |
Himmel und Erde: ihr Zwischenreich |
|
其猶橐籥**乎?! |
06 |
scheint einem Dudelsacke gleich: |
|
虛而不屈, |
07 |
Fällt nicht zusammen, so doch leer, |
|
動而愈出。 |
08 |
regt schöpferisch sich umso mehr. |
|
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|
* |
c 09-10 |
* |
|
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|
多言數窮, |
09 |
Anstatt man wortreich Erschöpfung litte – |
|
不如守中。 |
10 |
bewahrt man besser seine Mitte! |
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06 |
|
06 |
|
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* |
a 01-06 |
* |
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谷神不死 |
01 |
Unsterblich ist des Tales Geist, |
|
是謂玄牝。 |
02 |
geheimnisvoll-weiblich, wie es heißt. |
|
玄牝之門 |
03 |
Die Pforte zur Mystischen Urmutter hin: |
|
是謂
天地根。 |
04 |
für Himmel und Erde der Urbeginn. |
|
綿綿若存, |
05 |
Wie allgegenwärtige Fädchen, so fein – |
|
用之不勤。 |
06 |
genutzt werden sie unerschöpflich sein! |
|
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07 |
|
07 |
|
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|
* |
a 01-04 |
* |
|
|
|
|
|
天長
地久。 |
01 |
Beständig der Himmel, von Dauer die Erde – |
|
天地
所以能
長且久者, |
02 |
wodurch er so ewig, sie dauerhaft werde? |
|
以其不自生, |
03 |
Da sie nach eigenem Leben nicht streben, |
|
故能長生。 |
04 |
daher können sie lange leben. |
|
|
|
|
|
* |
b 05-10 |
* |
|
|
|
|
|
是以
聖人後
其身 |
05 |
So stellen Weise sich hintan |
|
而身先, |
06 |
und kommen doch selbst dabei voran, |
|
外其身 |
07 |
Deiner selbst entäußere dich – |
|
而
身存。 |
08 |
denn so bewahrt man selber sich. |
|
非
以其無
私邪? |
09 |
Nicht wahr, weil selbstlos so indessen, |
|
故能成
其私。 |
10 |
erfüllt man eigene Interessen! |
|
|
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|
08 |
|
08 |
|
|
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|
|
|
* |
a 01-05 |
* |
|
|
|
|
|
上善若水。 |
01 |
Die höchste Güte gleicht Wasser allein: |
|
水善利
萬物 |
02 |
wird allen Wesen nützlich sein – |
|
而不爭, |
03 |
doch führt es keinen Wettstreit ein; |
|
處眾
人之所惡, |
04 |
es weilt auch an Orten, wo jedermann weicht – |
|
故幾於道。 |
05 |
weswegen es nah an das Dào reicht. |
|
|
|
|
|
* |
b 06-12 |
* |
|
|
|
|
|
居善地, |
06 |
Das Wohnen zählt nach rechten Plätzen, |
|
心善淵 |
07 |
im Herzen wird man Tiefe schätzen, |
|
與善仁, |
08 |
im Geben zählt Menschlichkeit allein, |
|
言善信, |
09 |
im Reden schätzt man aufrichtig sein, |
|
正善治, |
10 |
die Ordnung schätzt man am Verwalten, |
|
事善能, |
11 |
Geschäfte sollten Können entfalten, |
|
動善時。 |
12 |
Taten den rechten Zeitpunkt enthalten. |
|
|
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|
* |
c 13-14 |
* |
|
|
|
|
|
夫唯不爭, |
13 |
Denn ohne Wettstreiten allein – |
|
故無尤。 |
14 |
so wird man ohne Tadel sein. |
|
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09 |
|
09 |
|
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|
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|
* |
a 01-04 |
* |
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|
持而盈之 |
01 |
Überspannt man den Bogen – und hält ihn doch fest: |
|
不如其己; |
02 |
das ist nicht so gut, wie wenn man es lässt! |
|
揣而銳之 |
03 |
(Waffen) polieren und schärfen sodann – |
|
不可長保; |
04 |
dann schützen sie auch nicht mehr s lang! |
|
|
|
|
|
* |
b 05-08 |
* |
|
|
|
|
|
金玉滿堂 |
05 |
Gold und Jade, sie füllen die Halle: |
|
莫之能守; |
06 |
niemand kann sie bewachen alle; |
|
富貴而驕, |
07 |
reich, geehrt folgt Hochmut daraus, |
|
自遺其
咎。 |
08 |
liefert man selbst sich dem Unglück aus! |
|
|
|
|
|
* |
c 11-10 |
* |
|
|
|
|
|
功遂
身退, |
09 |
Rückzug, da das Werk vollbracht – |
|
天之道載。 |
10 |
wie es das Dào des Himmels macht. |
|
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|
10 |
|
10 |
|
|
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||
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|
|
|
* |
a 01-06 |
* |
|
|
|
|
|
載營魄
抱一, |
01 |
Geist fördern und Seele: die Einheit behalten – |
|
能無離乎?! |
02 |
kannst du das, ohne dich zu spalten? |
|
專氣
致柔, |
03 |
Lebenskraft bündeln und Weichheit erreichen – |
|
能嬰兒乎?! |
04 |
kannst du dem Neugeborenen gleichen? |
|
滌除玄覽, |
05 |
Die finstere Sicht, spül’ sie hinweg – |
|
能無疵乎?! |
06 |
kannst du rein sein ohne Fleck? |
|
|
|
|
|
* |
b 07-12 |
* |
|
|
|
|
|
愛民治國, |
07 |
In Liebe zum Volk das Land verwalten – |
|
能無知乎?! |
08 |
kannst du das ohne Wissen entfalten? |
|
天門
開闔, |
09 |
Wie Himmelspforten sich öffnen und schließen – |
|
能為雌乎?! |
10 |
kannst du so weiblich-passiv fließen? |
|
明白
四達, |
11 |
Mit klarem Verständnis alles durchdringen – |
|
能無知乎?! |
12 |
kann ohne Gelehrsamkeit es gelingen? |
|
|
|
|
|
* |
c 13-17 |
* |
|
|
|
|
|
生之,畜之, |
13 |
Hervorbringen etwas und ihm nützen, |
|
生而不有, |
14 |
erschaffen, doch es nicht besitzen, |
|
為而不恃, |
15 |
handeln, doch es nie erzwingen, |
|
長而不宰, |
16 |
führen, doch ohne Führerschaft – |
|
是謂玄德。 |
17 |
das nennt man tiefe Innere Kraft. |
|
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|
|
11 |
|
11 |
|
|
|
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|
|
||
|
|
|
|
|
* |
a 01-02 |
* |
|
|
|
|
|
三十幅共 |
01 |
Wo dreißig Speichen zur Nabe hin enden, |
|
當其無有
車之用。 |
02 |
lässt gerade das Nichts ein Rad gut verwenden. |
|
|
|
|
|
* |
b 03-04 |
* |
|
|
|
|
|
埏埴以為器,yán zhí yǐ wéi qì, |
03 |
Forme den Ton, mach' Gefäße daraus: |
|
當其無有
器之用。 |
04 |
das Nichts gerade macht ihre Brauchbarkeit aus. |
|
|
|
|
|
* |
c 05-06 |
* |
|
|
|
|
|
鑿戶牖
以為室, |
05 |
Stemmt man Fenster aus und Türen, |
|
當其無有
室之用。 |
06 |
gerade aus Nicht-Sein dient so weit |
|
|
|
|
|
* |
d 07-08 |
* |
|
|
|
|
|
故
有之
以為利, |
07 |
So müht das Sein sich zum Gewinn – |
|
無之
以為用。 |
08 |
das Nichts erwirkt den Nutzen darin. |
|
|
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|
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|
12 |
|
12 |
|
|
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|
|
||
|
|
|
|
|
* |
a 01-03 |
* |
|
|
|
|
|
五色
令人目盲, |
01 |
Fünf Grundfarben blenden das Auge sehr, |
|
五音
令人耳聾, |
02 |
fünf Grundtöne betäuben unser Gehör, |
|
五味
令人
口爽。 |
03 |
fünf Gewürze des Menschen Geschmack noch mehr. |
|
|
|
|
|
* |
b 04-07 |
* |
|
|
|
|
|
馳騁畋獵令, |
04 |
Rennen, Hasten, Treiben, Jagen ... |
|
人心發狂; |
05 |
lassen das menschliche Herz verzagen; |
|
難得之貨 |
06 |
die schwer zu erlangenden Güter im Lande |
|
令
人行妨。 |
07 |
sind eure Entfaltung zu hindern imstande! |
|
|
|
|
|
* |
c 08-10 |
* |
|
|
|
|
|
是以聖人, |
08 |
Weil für den Weisen |
|
為腹
不為目; |
09 |
Bedürfnisse zählen,
|
|
故去彼
取此。 |
10 |
so lässt er dieses, um jenes zu wählen. |
|
|
|
|
|
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|
|
13 |
|
13 |
|
|
|
|
|
|
||
|
|
|
|
|
* |
a 01-02 |
* |
|
|
|
|
|
寵辱
若驚, |
01 |
Die Gunst, die wie Ungunst ein Schrecken wäre, |
|
貴大患
若身。 |
02 |
eine große Sorge wie Selbstsucht – die Ehre? |
|
|
|
|
|
* |
b 03-07 |
* |
|
|
|
|
|
何謂
寵辱
若驚? |
03
|
Wie? - „Gunst und Ungunst sind wie ein Schrecken.“
|
|
寵為下。 |
04 |
Die Gunst wird zur Erniedrigung führen: |
|
得之若驚, |
05 |
Sie zu erlangen heißt Furcht erwecken, |
|
失之若驚, |
06 |
gleichfalls erschreckend, sie zu verlieren – |
|
是謂寵辱
若驚。 |
07 |
das meint: „Gunst und Ungunst sind wie ein Schrecken.“ |
|
|
|
|
|
* |
c 08-11 |
* |
|
|
|
|
|
何謂 |
08 |
Was heißt, „eine große Sorge wäre, |
|
吾所以有
大患者, |
09 |
Ich habe große Sorgen mithin, |
|
為吾有身, |
10 |
da handelnd ich eigennützig bin; |
|
及吾無身,
吾有何患? |
11 |
erreichte ich Selbstlosigkeit jedoch, |
|
|
|
|
|
* |
d 12-15 |
* |
|
|
|
|
|
故貴
以身
為天下, |
12 |
Wem so aus dem Herzen zu wirken gefällt, |
|
若可寄天下。 |
13 |
dem kann man sie anvertrauen, die Welt. |
|
愛以身
為天下, |
14 |
Wer von Herzen es liebt, sich mit ihr zu befassen, |
|
若可託天下。 |
15 |
dem kann man getrost die Welt überlassen. |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
14 |
|
14 |
|
|
|
|
|
|
||
|
|
|
|
|
* |
a 01-06 |
* |
|
|
|
|
|
視之不見: |
01 |
Du schaust – und nimmst es doch nicht wahr: |
|
名曰夷; |
02 |
sein Name lautet „Unsichtbar“; |
|
聽之不聞: |
03 |
du horchst – nichts, was zu hören war: |
|
名曰希; |
04 |
sein Name lautet „Unhörbar“; |
|
摶之不得: |
05 |
du greifst – nichts ist zu fassen da: |
|
名曰微。 |
06 |
sein Name lautet „Unfassbar“. |
|
|
|
|
|
* |
b 07-12 |
* |
|
|
|
|
|
此三者
不可致詰, |
07 |
Drei Wege, man kann sie nicht erkunden ...
|
|
故混
而為一: |
08 |
so sind sie, als Einheit gebildet, verbunden: |
|
其上不皦, |
09 |
die oben nicht hell ist – |
|
其下不昧, |
10 |
und dunkel nicht unten, |
|
繩繩
不可名, |
11 |
wie endlos, grenzenlos, ohne Namen, |
|
復歸
於無物。 |
12 |
zurück, als ob sie zur Heimkehr kamen, |
|
|
|
|
|
* |
c 13-17 |
* |
|
|
|
|
|
是謂
無狀之狀, |
13 |
Heißt Form, die ins Formlose entschwand, |
|
無物之象, |
14 |
als Abbild eines Wesenlosen – |
|
是謂惚恍。 |
15 |
verborgenes Chaos auch genannt. |
|
迎之
不見其首, |
16 |
Willst du ihm entgegen stoßen, |
|
隨之
不見其後。 |
17 |
ihm folgend, nicht sehen auf sein Ende hin. |
|
|
|
|
|
* |
d 18-21 |
* |
|
|
|
|
|
執古之道: |
18 |
Am uralten Dào halte man fest – |
|
以御今之有。 |
19 |
was so auch die Gegenwart meistern lässt. |
|
能知古始, |
20 |
Den Urbeginn verstehen können |
|
是謂道紀。 |
21 |
kann „Dào's roten Faden“ man nennen. |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
15 |
|
15 |
|
|
|
|
|
|
||
|
|
|
|
|
* |
a 01-05 |
* |
|
|
|
|
|
古之善
為士者 |
01 |
Des Altertums trefflichen Meistern gelang, |
|
微妙
玄通, |
02 |
subtil, was geheimnisvoll tief durchdrang, |
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深
不可識。 |
03 |
eine Tiefe, unmöglich ergründet. |
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夫唯
不可識, |
04 |
Doch weil man sie undurchschaubar findet, |
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故強
為之容。 |
05 |
so seien sie notfalls durch Bilder verkündet: |
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b 06-12 |
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豫焉
若冬
涉川; |
06 |
Ach, wie behutsam irgendwie |
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猶兮
若畏
四鄰; |
07 |
mit Vorsicht! – als ob von allen vier Seiten |
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儼兮
其若客 |
08 |
höflich, ach, wie von Gästen man weiß, |
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猶兮
若冰之將釋; |
09 |
so sanft, als schmölze gleich das Eis; |
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敦兮
其若樸; |
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ursprünglich, ach, wie Naturholz einmal, |
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曠兮其若谷; |
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die offen, ach, wie Täler wären, |
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混兮
其若濁; |
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undurchschaubar! - wie trübe Gewässer. |
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c 13-17 |
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孰能濁以[止]
靜之
徐清? |
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Wer sieht das Trübe durch Stille besser, |
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孰能安以
久動之
徐生? |
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Wer hilft durch dauerndes Bewegen, |
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保此道 者不欲盈: zhě bú yù yíng: |
15 |
Bewahrt das Dào , begehrt nicht zu füllen: |
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夫唯不盈, |
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denn ohne nach Überfülle zu gieren, |
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故能蔽不新成。 |
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nur derart könnt ihr euch verhüllen |
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16 |
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16 |
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a 01-02 |
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致虛極, |
01 |
Die Leere im Äußersten erfahren, |
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守靜篤。 |
02 |
im Innersten die Ruhe bewahren. |
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b 03-06 |
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萬物
並作, |
03 |
Die Wesen, sie alle entfalten sich, |
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吾以觀復。 |
04 |
doch ihre Heimkehr erschaue ich … |
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天物:
芸芸
– |
05 |
Des Himmels Geschöpfe, ganz ohne Zahl, |
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各復歸其根。 |
06 |
kehren heim alle zu ihren Wurzeln einmal. |
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c 07-10 |
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歸根曰
靜, |
07 |
Heimkehr zur Wurzel meint: ruhiges Gemüt, |
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是謂復命; |
08 |
heißt Rückkehr, die zur Bestimmung zieht; |
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復命fù mìng
曰常, |
09 |
zur Bestimmung zurück, die Beständigkeit heißt, |
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知常曰
明。 |
10 |
Beständigkeit, die zur Erleuchtung weist. |
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d 11-17 |
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不知常: |
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Nicht wissen, was denn beständig sei: |
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妄作凶。 |
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ruft achtlos dann das Unheil herbei. |
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知常容, |
13 |
Wie Wissen um Dauer Toleranz entfacht |
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容乃公, |
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und Duldsamkeit unparteilich macht: |
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公乃王, |
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unparteilich wird Größe sein, |
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王乃天, |
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Größe führt das Himmlische ein, |
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天乃道。 |
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Himmlisches führt zum Dào allein. |
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e 18-19 |
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道乃久: |
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